HARYANA VRITANT

Kurukshetra News अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में पवित्र ब्रह्मसरोवर के तट पर विभिन्न राज्यों की लोक संस्कृति का प्रदर्शन हो रहा है, जिसमें महाराष्ट्र का पारंपरिक लोक नृत्य धनगरी गाजा प्रमुख आकर्षण बना हुआ है। यह नृत्य न केवल पर्यटकों को मंत्रमुग्ध करता है, बल्कि महाराष्ट्र की संस्कृति को जीवित भी रखता है।

भगवान शंकर के तांडव का रूप

धनगरी गाजा नृत्य भगवान शंकर के तांडव नृत्य की तर्ज पर किया जाता है, जो महाराष्ट्र के सांगली और सोलापुर ज़िले के धनगर समुदाय द्वारा किया जाता है। यह नृत्य विशेष रूप से चरवाहों, भैंस और बकरी पालने वालों तथा कंबल बुनकरों के बीच प्रचलित है। नृत्य की शुरुआत भगवान शंकर के तांडव से जुड़ी कथाओं से होती है, जब माता पार्वती के रूठने पर भगवान शंकर उन्हें मनाने के लिए तांडव करते हैं।

पारंपरिक नृत्य का कठिन और रोमांचक प्रदर्शन

यह नृत्य बहुत ही कठिन और रोमांचक होता है, जिसमें कलाकार दो से चार घंटे तक नृत्य करते हैं, लेकिन गीता महोत्सव के दौरान यह नृत्य केवल आधे घंटे में पूरा किया जाता है, जो कलाकारों के लिए एक बड़ी चुनौती है। कलाकार अपनी पूरी तैयारी और शुद्धता के साथ इस नृत्य को प्रस्तुत करते हैं।

नृत्य की रगों में बसी विरासत

अनिल भीमराव, जो इस नृत्य टीम के प्रमुख हैं, बताते हैं कि धनगरी गाजा उनके समुदाय की रगों में बसा हुआ नृत्य है। वे खुद एक आईटी इंजीनियर हैं और उनकी टीम में अन्य पेशेवर भी काम करते हैं, लेकिन इस नृत्य से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। यह नृत्य केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुका है। अनिल भीमराव और उनकी टीम ने विदेशों में भी यह नृत्य प्रस्तुत किया है, जैसे इंग्लैंड (2003) और रूस (2008) में, और भारत के विभिन्न राज्यों में भी इसे प्रदर्शित किया है।

धनगरी गाजा: लोक नृत्य से अंतरराष्ट्रीय पहचान तक

धनगरी गाजा नृत्य की प्रसिद्धि न केवल महाराष्ट्र बल्कि देश-विदेश में फैल चुकी है। कलाकारों ने इसे न केवल विभिन्न भारतीय शहरों में बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी प्रस्तुत किया है, जिससे यह लोक नृत्य अब वैश्विक पहचान पा चुका है।