UGC Act उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में अधिसूचित नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर आज सुनवाई की। अदालत ने 13 जनवरी को नोटिफाई किए गए “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026” पर फिलहाल रोक लगा दी है और इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने नियमों की भाषा को स्पष्ट करने की जरूरत पर भी जोर दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।

UGC Act पर उच्चतम न्यायालय की अहम टिप्पणियां:
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने नए नियमों पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश को जातिविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, न कि पीछे की ओर। UGC Act
CJI ने टिप्पणी की कि शैक्षणिक संस्थानों में भारत की एकता और समावेशन की भावना दिखनी चाहिए।
पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि SC/ST छात्रों के लिए अलग हॉस्टल जैसी व्यवस्थाओं से बचा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरक्षित वर्गों के भीतर भी आर्थिक और सामाजिक असमानताएं हैं—कुछ समुदाय दूसरों की तुलना में अधिक सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं।
अदालत ने आगे कहा कि नियमों की परिभाषाएं स्पष्ट नहीं हैं, जिससे उनके दुरुपयोग की आशंका है। कुछ विशेषज्ञों द्वारा इनमें संशोधन की सलाह दी जा सकती है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जब 3(e) प्रणाली पहले से मौजूद है, तो 3(c) प्रणाली की प्रासंगिकता क्या है और क्या यह अनावश्यक है।
याचिका में क्या कहा गया है?
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि UGC Act के ये नियम प्रकृति में अनुचित हैं, क्योंकि इनमें सामान्य वर्ग के छात्रों को शिकायत निवारण तंत्र और संस्थागत सुरक्षा से बाहर रखा गया है।
याचिका में कहा गया है कि जाति पहचान के आधार पर शिकायत निवारण तक पहुंच से इनकार करना अस्वीकार्य राज्य भेदभाव के समान है, जो समानता के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है और गैर-आरक्षित वर्गों के खिलाफ दुश्मनी को बढ़ावा दे सकता है।

नियमों का उद्देश्य क्या है?
UGC Act ने ये नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने और समानता व समावेशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए थे।
इनका मकसद धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है।
नियमों के तहत, उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसर केंद्र और समानता समितियों की स्थापना अनिवार्य की गई है, ताकि वंचित वर्गों से जुड़ी शिकायतों की जांच की जा सके और नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी है और अब इस पूरे मामले पर अगली सुनवाई 19 मार्च को की जाएगी।