UGC Bill

UGC Bill से जुड़े नए प्रस्तावित नियमों को लेकर देशभर में विरोध की आंच लगातार तेज होती जा रही है। शुरुआत भले ही सोशल मीडिया से हुई हो लेकिन अब यह असंतोष सड़कों, संगठनों और यहां तक कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के भीतर तक पहुंच चुका है। दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे विवाद में सरकार और मुख्य विपक्ष की ओर से कोई ठोस या स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है जबकि छात्र, शिक्षक, सामाजिक संगठन और राजनीतिक दलों के कुछ नेता खुलकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं।

UGC Bill

UGC Bill को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा

क्या यह उच्च शिक्षा की स्वायत्तता सामाजिक संतुलन और अकादमिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है। इसी आशंका के चलते कई जगह छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किए हैं शिक्षाविदों ने बयान दिए हैं और अब सत्तारूढ़ दल के नेता भी खुलकर असहमति जता रहे हैं।

बीजेपी के भीतर उभरे इस असंतोष ने पार्टी के लिए स्थिति को और असहज बना दिया है। गोंडा से बीजेपी विधायक और बृजभूषण शरण सिंह के पुत्र प्रतीक भूषण ने सार्वजनिक रूप से ऐतिहासिक दृष्टिकोण और सामाजिक विमर्श पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय समाज के एक वर्ग को लगातार ‘ऐतिहासिक अपराधी’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि विदेशी आक्रांताओं और उपनिवेशी अत्याचारों को ‘अतीत की बात’ कहकर भुला दिया जाता है। उनका बयान सीधे तौर पर उस वैचारिक असंतुलन की ओर इशारा करता है जो UGC Bill जैसे मुद्दों पर उभरकर सामने आ रहा है।

इसी क्रम में रायबरेली से बीजेपी नेता रमेश बहादुर सिंह और गौरक्षा दल के अध्यक्ष महेंद्र पांडेय द्वारा पार्टी के सवर्ण नेताओं को चूड़ियां भेजने का मामला भी काफी चर्चा में है। इसे प्रतीकात्मक विरोध के तौर पर देखा जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर ही कुछ नेता नेतृत्व की चुप्पी से बेहद नाराज़ हैं और इसे कमजोरी के रूप में देख रहे हैं।
विरोध की यह लहर केवल राजनीतिक दायरे तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के पोस्टरों पर स्याही फेंकने का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है। भले ही वीडियो की जगह की पुष्टि नहीं हो पाई हो लेकिन यह साफ संकेत देता है कि आम लोगों के बीच गुस्सा बढ़ रहा है और UGC Bill अब केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक सवाल बनता जा रहा है।

इस विवाद को और गंभीर बना दिया था पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने। उन्होंने UGC Bill नियमों की तुलना रोलेट एक्ट से करते हुए राज्यपाल को लिखे पत्र में कहा था कि ब्राह्मण और सामान्य वर्ग के जनप्रतिनिधि अपने समाज के प्रति जवाबदेह होने के बजाय कॉरपोरेट हितों के सेवक बनते जा रहे हैं। उन्होंने यहां तक लिखा कि सामान्य वर्ग खुद को अनाथ महसूस कर रहा है और अब वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था की आवश्यकता है जो इस वर्ग के हितों की रक्षा कर सके।

सांस्कृतिक और साहित्यिक जगत से भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कवि कुमार विश्वास ने स्वर्गीय रमेश रंजन की कविता की पंक्तियां साझा कर बीजेपी पर तंज कसते हुए सवर्ण समाज की पीड़ा को शब्दों में रखा। वहीं खेल जगत से ओलंपिक पदक विजेता पहलवान योगेश्वर दत्त ने महाभारत के पांडवों का उदाहरण देकर सरकार तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की।

यूपी विधान परिषद सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने भी UGC को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि इस तरह के नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई का माहौल बिगाड़ सकते हैं। उन्होंने संतुलन की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि नीतियां ऐसी हों जिससे दलित, पिछड़े और सामान्य वर्ग किसी के साथ अन्याय न हो और किसी भी वर्ग के छात्र खुद को असुरक्षित महसूस न करें।

कुल मिलाकर, UGC Bill अब केवल एक शैक्षणिक सुधार का मसौदा नहीं रह गया है। यह सामाजिक संतुलन राजनीतिक साहस और वैचारिक स्पष्टता की परीक्षा बन चुका है। जिस तरह से पार्टी के भीतर से ही विरोध की आवाजें उठ रही हैं उससे यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा सरकार के लिए और बड़ी चुनौती बन सकता है।